४० . जिनके ओजस्वी वचनों से, गूँज उठा था विश्व गगन

 ४० . जिनके ओजस्वी वचनों से, गूँज उठा था विश्व गगन


जिनके ओजस्वी वचनों से, गूँज उठा था विश्व गगन । 
वही प्रेरणा पुंज हमारे , स्वामी पूज्य विवेकानंद ॥ ध्रु ० ॥ 

जिनके माथे गुरुकृपा थी, दैविक गुण आलोक भरा । 
अद्भुत प्रज्ञा प्रकटी जग में, धन्य धन्य यह पुण्य धरा । 
सत्य सनातन परम ज्ञान का, जो करते अभिनव चिंतन ॥ १ ॥ 

जिनका फौलादी भुजबल था, हर संकट में सदा अटल ।  
मर्यादित, तेजस्वी जीवन, सजग समर्पित था हर पल । 
हो निर्भय जो करे गर्जना, जिनके अन्तस दिव्य अगन ॥ २ ॥ 

जिनके रोम रोम में करुणा, समरस जनजीवन की चाह ।
नष्ट करे सारे भेदों को, सेवाव्रत ही सच्च्ची राह । 
दरिद्र ही नारायण जिनका, हर धड़कन में अपनापन ॥ ३ ॥ 

जिनके मन था स्वप्न महान, हो भारत का पुनरुत्थान । 
जीवनदीप जलाकर पायें, गौरवमय - वैभव, सम्मान । 
जगती में सब सुखद-सुमंगल, बहे सुगन्धित मुक्त पवन ॥ ४ ॥ 

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