४३ . ॐ जय जगदीश हरे
४३ . ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरेभक्त जनों के संकट, दास जनों के संकटक्षण में दूर करेॐ जय जगदीश हरे ||धृ०||जो ध्यावे फल पावे दुःख बिन से मन कास्वामी दुख बिन से मन कासुख सम्पति घर आवेकष्ट मिटे तन काॐ जय जगदीश हरे ||१||मात पिता तुम मेरेशरण गहूं किसकीस्वामी शरण गहूं किसकीतुम बिन और ना दूजातुम बिन और ना दूजाआस करूँ जिसकीॐ जय जगदीश हरे||२||तुम पूरण परमात्मातुम अंतरियामीस्वामी तुम अंतरियामीपार ब्रह्म परमेश्वरपार ब्रह्म परमेश्वरतुम सबके स्वामीॐ जय जगदीश हरे||३||तुम करुणा के सागरतुम पालन करतामैं मूरख खलकामीमैं सेवक तुम स्वामीकृपा करो भर्ताॐ जय जगदीश हरे||४||तुम हो एक अगोचरसबके प्राण पतिकिस विध मिलु दयामयतुम को मैं कुमतिॐ जय जगदीश हरे||५||दीन बन्धु दुःख हर्ताठाकुर तुम मेरेस्वामी रक्षक तुम मेरेअपने हाथ उठाओअपनी शरण लगाओद्वार पड़ा तेरेॐ जय जगदीश हरे ||६||विषय-विकार मिटाओ
पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओश्रद्धा भक्ति बढ़ाओसन्तन की सेवाॐ जय जगदीश हरेस्वामी जय जगदीश हरे ||७||
Comments
Post a Comment