३२ . उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके

 ३२ .  उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके


उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके

 क्या पाऊंगा भगवन मैं अपने ही घर को तोड के ||धृ ०||


भाई बंधू सखा और स्नेही वयोवृद्ध ये गुरुजन 

शत्रु पक्ष में खडे सामने टूट रहा मेरा मन 

इन्हे मारने से अच्छा है नष्ट करूं ये जीवन 

कैसे जीवन जिउं बता केशव इनसे बैर जोडके ||१||


देख के ही अर्जुन की हालत बोले श्री भगवान 

शरीर ही मरते है आत्मा को अमर तू जान 

कर्म किये जा फल की इच्छा ना करना नादान 

तू निमित्त है करता मत बन कायरता को छोडके ||२||


कौन किसी को मारे अर्जुन कौन किसी को तारे 

कर्मोसे ही जीते इंसान कर्म से ही हारे 

काल खा रहा सबको अर्जुन तुम क्या किसी को मारे 

विश्वरूप तू देख मेरा इस और तनिक मुह मोडके  ||३||


विश्वरूप भगवान देखकर चकित हो गया पार्थ महान 

सारा जगत समाया जिसमें अर्जुना भी था अंश समान 

चरणों में गिर पडा कृष्ण के बोला क्षमा करो भगवान 

उठा लिया गांडिव धनुष अर्जुन बोला कर जोडके 

आज दिखा दूंगा केशव इतिहास देश का मोडके ||४||

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