Posts

४५ आता विसाव्याचे क्षण

४५  आता विसाव्याचे क्षण  आता विसाव्याचे क्षण  माझे सोनियाचे मणी  सुखे गोवित ओवित  त्याची ओढतो स्मरणी  काय सांगावे नवल  दूर रानीची पाखरे  ओल्या अंगणी नाचता  होती माझीच नातरे  कधी होती डोळे ओले  मन माणसाची तळी  माझे पैलातले हंस  डोल घेती त्याच्या जळी  कधी पांगल्या प्रेयसी  जुन्या विझवून चुली आश्वासती येत्या जन्मी  होऊ तुमच्याच मुली  मणी ओढता ओढता  होती त्याचीच आसवे  दूर असाल तिथे हो  नांदतो मी तुम्हांसवे

४४ हे शारदे मां अज्ञानता से हमें तार दे माँ

 ४४  हे शारदे मां  अज्ञानता से हमें तार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ अज्ञानता से हमें तार दे माँ हे शारदे माँ॥ तू स्वर की देवी, ये संगीत तुझसे हर शब्द तेरा है, हर गीत तुझसे हम है अकेले, हम है अधूरे तेरी शरण हम, हमें प्यार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ अज्ञानता से हमें तार दे माँ॥ मुनियों ने समझी, गुणियों ने जानी वेदों की भाषा, पुराणों की बानी हम भी तो समझे, हम भी तो जाने विद्या का हमको अधिकार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ अज्ञानता से हमें तार दे माँ॥ तू श्वेतवर्णी, कमल पर विराजे हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साजे मन से हमारे मिटाके अँधेरे हमको उजालों का संसार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ अज्ञानता से हमें तार दे माँ॥

४३ . ॐ जय जगदीश हरे

 ४३ .   ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट क्षण में दूर करे ॐ जय जगदीश हरे ||धृ०|| जो ध्यावे फल पावे दुःख बिन से मन का स्वामी दुख बिन से मन का सुख सम्पति घर आवे कष्ट मिटे तन का ॐ जय जगदीश हरे ||१|| मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी स्वामी शरण गहूं किसकी तुम बिन और ना दूजा तुम बिन और ना दूजा आस करूँ जिसकी ॐ जय जगदीश हरे||२|| तुम पूरण परमात्मा तुम अंतरियामी स्वामी तुम अंतरियामी पार ब्रह्म परमेश्वर पार ब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी ॐ जय जगदीश हरे||३|| तुम करुणा के सागर तुम पालन करता मैं मूरख खलकामी मैं सेवक तुम स्वामी कृपा करो भर्ता ॐ जय जगदीश हरे||४|| तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पति किस विध मिलु दयामय तुम को मैं कुमति ॐ जय जगदीश हरे||५|| दीन बन्धु दुःख हर्ता ठाकुर तुम मेरे स्वामी रक्षक तुम मेरे अपने हाथ उठाओ अपनी शरण लगाओ द्वार पड़ा तेरे ॐ जय जगदीश हरे ||६|| विषय-विकार मिटाओ  पाप हरो देवा श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ सन्तन की सेवा ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे ||७||

४२ . सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी

 ४२ .  सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ १|| कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥२|| लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़। महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥३|| हुई वीर...

४१ . पसायदान

 ४१ . पसायदान  आतां विश्वात्मकें देवें । येणें वाग्यज्ञें तोषावें ।  तोषोनि मज द्यावें । पसायदान हें ॥ १ ॥ जे खळांची व्यंकटी सांडो । तयां सत्कर्मीं रती वाढो |  भूतां परस्परें जडो। मैत्र जीवांचें ॥ २ ॥ दुरिताचें तिमिर जावो । विश्व स्वधर्म सूर्यें पाहो ।  जो जें वांछील तो तें लाहो । प्राणिजात ॥ ३ ॥ वर्षत सकळमंगळीं । ईश्वर निष्ठांची मांदियाळी ।  अनवरत भूमंडळीं । भेटतु  भूतां ॥ ४ ॥ चलां कल्पतरूंचे आरव । चेतना चिंतामणीचें गांव ।  बोलते जे अर्णव । पीयूषाचे ॥ ५ ॥ चंद्रमे जे अलांछन । मार्तंड जे तापहीन ।  ते सर्वांही सदा सज्जन । सोयरे होतु ॥ ६ ॥ किंबहुना सर्वसुखीं । पूर्ण होऊनि तिहीं लोकीं ।  भजिजो आदिपुरुखीं । अखंडित ॥ ७ ॥ आणि ग्रंथोपजीविये । विशेषीं लोकीं इयें ।  दृष्टादृष्ट विजयें । होआवें जी ॥ ८ ॥ येथ म्हणे श्रीविश्वेशरावो । हा होईल दानपसावो ।  येणें वरें ज्ञानदेवो । सुखिया झाला ॥ ९ ॥

४० . जिनके ओजस्वी वचनों से, गूँज उठा था विश्व गगन

 ४० .  जिनके ओजस्वी वचनों से,  गूँज उठा था विश्व गगन जिनके ओजस्वी वचनों से, गूँज उठा था विश्व गगन ।  वही प्रेरणा पुंज हमारे , स्वामी पूज्य विवेकानंद ॥ ध्रु ० ॥  जिनके माथे गुरुकृपा थी, दैविक गुण आलोक भरा ।  अद्भुत प्रज्ञा प्रकटी जग में, धन्य धन्य यह पुण्य धरा ।  सत्य सनातन परम ज्ञान का, जो करते अभिनव चिंतन ॥ १ ॥  जिनका फौलादी भुजबल था, हर संकट में सदा अटल ।   मर्यादित, तेजस्वी जीवन, सजग समर्पित था हर पल ।  हो निर्भय जो करे गर्जना, जिनके अन्तस दिव्य अगन ॥ २ ॥  जिनके रोम रोम में करुणा, समरस जनजीवन की चाह । नष्ट करे सारे भेदों को, सेवाव्रत ही सच्च्ची राह ।  दरिद्र ही नारायण जिनका, हर धड़कन में अपनापन ॥ ३ ॥  जिनके मन था स्वप्न महान, हो भारत का पुनरुत्थान ।  जीवनदीप जलाकर पायें, गौरवमय - वैभव, सम्मान ।  जगती में सब सुखद-सुमंगल, बहे सुगन्धित मुक्त पवन ॥ ४ ॥ 

३९ . जब हि नगाडा बज हि गया है

 ३९ . जब हि नगाडा बज हि गया है जब हि नगाडा बज हि गया है, सरहद पर शैतान का  नक़्शे पर से नाम मिटा दो, पापी पाकिस्तान का ॥धृ ० ॥ कभी इधर से कभी उधर से घुसता है गुर्राता है  डल झेलम के मधु लहरों में गंदे पांव लगाता है  केसर पर बारूद छिड़कता अँगारे बरसाता है  न्यौता देता महाकाल को अपनी मौत बुलाता है  भूल गया है हरप-हरप लब खुद ही पाक कुरान का ॥ १ ॥ बोल दिया है धावा तो फिर शेरों कदम हटाना मत  तोपों के प्रलयंकर जबड़े तुम वापस पलटाना मत  सिद्धांतों की परिभाषा में अपने को उलझाना मत  धूल उड़ा देना पिंडी की पलभर दया दिखाना मत  फिर कब ऐसा वक्त आएगा लड्डू के भुगतान का ॥ २ ॥  अमन अहिंसा पंचशील के सरगम कुछ दिन गाओ मत  भड़क उठा है जरी तो फिर भड़की आग बुझाओ मत  पकी फसल की तरह काट दो जिन्दा एक बचाओ मत  लाख बार मर जाओ लेकिन माँ का दूध जलाओ मत  हिन्दुकुश पर गाडके आना झंडा हिन्दुस्थान का ॥ ३ ॥  खुलकर दो दो हाथ दिखाना संगाई तलवारों के  हथियारों से उत्तर देना दुश्मन के हुंकारों के  छाँट छाँट कर मुंड काटना घुसपैठी हत्यारों...