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Showing posts from August, 2022

३८ . मानवतेचे मंदिर माझे

 ३८ . मानवतेचे मंदिर माझे मानवतेचे मंदिर माझे आत लाविल्या ज्ञानज्योती  श्रमिकहो घ्या इथे विश्रांती ||धृ ०|| बंधुत्वाची येथ सावली अनाथ अमुचे माय माऊली  कधी दिसे का ईश रावुळी देव ते अंतरात नांदती||१|| आम्ही लाडके विठुरायाचे लेणे जरीही दारिद्र्याचे  अभंग ओठी मानवतेचे मृदुंगी वेदनेस विस्मृती ||२|| दार घराचे सदैव उघडे भागवताची ध्वजा फडफडे  भावभक्तीचे आम्हा साकडे पथिक हे परंपरा सांगती ||३||

३७ . अजब हाल देखो नयी रोशनी का

 ३७ . अजब हाल देखो नयी रोशनी का  अजब हाल देखो नयी रोशनी का  की दुनियां में क्या क्या व्यसन बिक रहे है | मन बिक चुके है तन बिक चुके है सदन बिक चुके अब वतन बिक रहे है | किरण बिग चुकी है हिरण बिक चुके है परम बिक चुके अब धरम बिक रहे है | बुजुर्ग के शाहाना इमान खोकर  पैसों के खातिर अपन बिक रहे है | जरा जाके उनके मा बहनोंको पूछो  गोदी से कितनी ललन बिक रही है | अनोखा तमाशा यहां का जितेंद्र  शरे आम  दुल्हा दुल्हन बिक रहे है | जमाने के मालिक जरा आँख खोलो  लंगोटी से चादर कफन बिक रहे हैं |

३६ . गगन मे लहरता है भगवा हमारा

 ३६ .  गगन मे लहरता है भगवा हमारा   घिरे घोर घन दासताँ के भयंकर गवाँ बैठे सर्वस्व आपस में लडकर बुझे दीप घर-घर हुआ शून्य अंबर निराशा निशा ने जो डेरा जमाया ये जयचंद के द्रोह का दुष्ट फल है जो अब तक अंधेरा सबेरा न आया मगर घोर तम मे पराजय के गम में विजय की विभा ले अंधेरे गगन में उषा के वसन दुष्मनो के नयन में चमकता रहा पूज्य भगवा हमारा॥१॥ भगावा है पद्मिनी के जौहर की ज्वाला मिटाती अमावस लुटाती उजाला नया एक इतिहास क्या रच न डाला चिता एक जलने हजारों खडी थी पुरुष तो मिटे नारियाँ सब हवन की समिध बन ननल के पगों पर चढी थी मगर जौहरों में घिरे कोहरो में धुएँ के घनो में कि बलि के क्षणों में धधकता रहा पूज्य भगवा हमारा ॥२॥ मिटे देवाता मिट गए शुभ्र मंदिर लुटी देवियाँ लुट गए सब नगर घर स्वयं फूट की अग्नि में घर जला कर पुरस्कार हाथों में लोंहे की कडियाँ कपूतों की माता खडी आज भी है भरें अपनी आंखो में आंसू की लडियाँ मगर दासताँ के भयानक भँवर में पराजय समर में अखीरी क्षणों तक शुभाशा बंधाता कि इच्छा जगाता कि सब कुछ लुटाकर ही सब कुछ दिलाने बुलाता रहा प्राण भगवा हमारा॥३॥ कभी थे अकेले हुए आज इतने नही ...

३५ . भारत स्काऊट गाईड झंडा ऊँचा सदा रहेगा

 ३५ .  भा रत स्काऊट गाईड झंडा ऊँचा सदा रहेगा  भारत स्काऊट गाईड झंडा ऊँचा सदा रहेगा  ऊँचा सदा रहेगा झंडा , ऊँचा सदा रहेगा || धृ ||  नीला रंग गगन सा विस्तृत भ्रातृभाव फैलता , त्रिदल कमल नित तीन प्रतिज्ञाओं की याद दिलाता  और चक्र कहता हैं प्रतिपल आगे कदम बढ़ेगा  || १ ||  ये चौबीसो आरे चक्र के हमसे प्रतिपल कहते  सावधान चौबीसो घंटे , हममें हैं बल भरते  तत्पर सदा रहे सेवामें जीवन सफल बनेगा   || २ || परहित रक्षामें हम जीवन , हँस हँस दे दे अपना  इस झंडेपर मरमिटनेका हैं सुखदायी सपना  सेवा का पथ दर्शक झंडा घरघरमें फहरेगा   || ३ || 

३४ . दया कर दान भक्ती का हमे परमात्मा देना

 ३४ . दया कर दान भक्ती का हमे परमात्मा देना  दया कर दान भक्ती का हमे परमात्मा देना  दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना ||धृ ०|| हमारे ध्यान में आओ प्रभू आखों में बस जाओ अंधेरे दिल में आकरके परम ज्योती जगा देना ||१|| बहा दो प्रेम की गंगा दिलों में प्रेम का सागर  हमें आपस में मिलजुलकर प्रभू रहना सिखा देना ||२|| हमारा कर्म हो सेवा हमारा धर्म हो सेवा सदा ईमान हो सेवा जो सेवकचर बना देना ||३|| वतन के वास्ते जीना वतन के वास्ते मरना  वतन पर जान फिदा करना प्रभू हमको सिखा देना ||४||

३३ . पकडे गये फिर चोर कन्हाई जब चुपचुपके माटी खायी

 ३३ . पकडे गये फिर चोर कन्हाई जब चुपचुपके माटी खायी पकडे गये फिर चोर कन्हाई जब चुपचुपके माटी खायी कोई गोपी आयी शिकायत लायी कान्हाको  डांटे यशोदा माई  ||धृ ०|| बोल लला मुख खोल लला इत उतको मत डोल लला  तेरी मुठ्ठी में क्या है जरा हां तो बता नही तो आज करूंगी पिटाई  ||१|| मुख बांधे मोहन नही बोले हात जोड इत उतको डोले  मांने पकड लिया कस के जकड लिया फिर तो हाथ में लकडी उठाई ||२|| खोला मुख मोहन ने पल में आंख यशोदा की क्या देखे  जग सारा का सारा मुखमंडलने धारा माता की आखें भर आयी ||३||  

३२ . उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके

 ३२ .  उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके उतर पडा लो रथ से अर्जुन धनुष्य बाण को छोडके  क्या पाऊंगा भगवन मैं अपने ही घर को तोड के ||धृ ०|| भाई बंधू सखा और स्नेही वयोवृद्ध ये गुरुजन  शत्रु पक्ष में खडे सामने टूट रहा मेरा मन  इन्हे मारने से अच्छा है नष्ट करूं ये जीवन  कैसे जीवन जिउं बता केशव इनसे बैर जोडके ||१|| देख के ही अर्जुन की हालत बोले श्री भगवान  शरीर ही मरते है आत्मा को अमर तू जान  कर्म किये जा फल की इच्छा ना करना नादान  तू निमित्त है करता मत बन कायरता को छोडके ||२|| कौन किसी को मारे अर्जुन कौन किसी को तारे  कर्मोसे ही जीते इंसान कर्म से ही हारे  काल खा रहा सबको अर्जुन तुम क्या किसी को मारे  विश्वरूप तू देख मेरा इस और तनिक मुह मोडके  ||३|| विश्वरूप भगवान देखकर चकित हो गया पार्थ महान  सारा जगत समाया जिसमें अर्जुना भी था अंश समान  चरणों में गिर पडा कृष्ण के बोला क्षमा करो भगवान  उठा लिया गांडिव धनुष अर्जुन बोला कर जोडके  आज दिखा दूंगा केशव इतिहास देश का मोडके ||४||

३१ . राम है जीवन कर्म हैं श्याम

 ३१ .  राम है जीवन कर्म हैं श्याम राम है जीवन कर्म हैं श्याम बोलो हरे राम बोलो हरे श्याम ||धृ ०|| जो नर दुख में दुख नही माने नही निंदा अस्तुति जाने काम क्रोध जही परसे नाही गुरु कृपा सोही नर सुख पाही सुख का विधाता है तेरो नाम ||१|| कोटि वेद जाको जस गावे विद्या कोटि पार ना पावे अगम आपर पार नही जाको नाम सुमीर सब जान सुख पाटो अगम पंथ है राम और श्याम ||२||

३० . रंग दे चुनरियां

 ३० .  रंग दे चुनरियां रंग दे चुनरि यां , रंग दे चुनरियां , श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरि यां   ।।धृ ०।। ऐसी रंग दे के रंग नही छूटे धोबिया धोए चाहे ये सारी उमरिया ।।१।। लाल ना रंगउ मैं  हरी ना रंगउ अपने ही रंग मे रंग दे चुनरि यां  ।।२।। बिना रंगाए  मैं  तो घर नही जाऊंगी बीत ही जाए  चाहे ये सारी उमरीयाँ ।।३।। मीरा के प्रभु गिरिधर नागर प्रभु चरणं मे, हरी चरणं मे श्याम चरणं मे लगी नज़रि यां  ।।४।। जल से पतला कौन है कौन भूमि से भारी कौन अगनसे तेज है कौन काजल से काली ? जल से पतला… पतला जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी क्रोध  अगन से  से तेज है और कलंक काजल से काली ।।

२९ . विमोह त्यागुनी कर्मफलांचा सिद्ध होई पार्था

 २९ . विमोह त्यागुनी कर्मफलांचा सिद्ध होई पार्था  विमोह त्यागुनी कर्मफलांचा सिद्ध होई पार्था  कर्तव्याने घडतो माणूस जाणुनी पुरुषार्था ।।धृ०।। शस्त्रत्याग तव शत्रुपुढती नच शोभे तुजला  कांतर होई समरी मग तू वीरोत्तम कसला  घे शस्त्रांते सुधीर होऊनि रक्षा या धर्मार्था ।।१।। कर्तव्याच्या पुण्यपथावर मोहांच्या फुलबागा  मोही फसता मुकशील वीरा मुक्तीच्या मार्गा  इहपरलोकी अशांतीने तव विक्रम झुकविल माथा ।।२।। कुणी आप्त ना कुणी सखा ना जगती जिव्हांचा  क्षणभंगुर ही संस्कृती आहे खेळ ईश्वराचा  भाग्य चालते कर्मपदांनी जाण खऱ्या वेदार्था ।।३।। रंगहीन मी या विश्वाच्या रंगाने रंगलो  कौरवांत मी पांडवात मी अणुरेणुत भरलो  मीच घडवितो मीच मोडितो उमज अता परमार्था ।।४।। कर्मफलांते अर्पुन मजला सोड अहंता वृथा  सर्वधर्म परि त्यजुनि येई शरण मला भारता  कर्तव्याची साद तुझ्या तुज सिध्द करी धर्मार्था ।।५।।

२८ . दान दिल्याने ज्ञान वाढते, त्या ज्ञानाचे मंदिर हे

 २८ .  दान दिल्याने ज्ञान वाढते, त्या ज्ञानाचे मंदिर हे दान दिल्याने ज्ञान वाढते, त्या ज्ञानाचे मंदिर हे सत्य शिवाहून सुंदर हे, सत्य शिवाहून सुंदर हे ।।धृ०।। इथे मोल ना दामाचे, मोती होतील घामाचे सरस्वतीच्या प्रेमाचे, प्रतिक रम्य शुभंकर हे ।।१।। चिरा चिरा हा घडवावा, कळस कीर्तिचा चढवावा अज्ञानी तो पढवावा, थेंब अम्ही तर सागर हे ।।२।। त्यागाला या नाव नसे, पुण्यवान हा देश असे कल्पतरू हा उभा दिसे, त्या छायेतील मंदिर हे ।।३।।

२७ . निंबोणीच्या झाडामागे चंद्र झोपला गं बाई

 २७ .  निंबोणीच्या झाडामागे  चंद्र झोपला गं बाई निंबोणीच्या झाडामागे  चंद्र झोपला गं बाई आज माझ्या पाडसाला  झोप का गं येत नाही ।।धृ०।। गाय झोपली गोठयात घरटयात चिऊताई परसात वेलीवर झोपल्या गं जाई जुई मिट पाकळ्या डोळ्यांच्या गाते तुला मी अंगाई ।।१।। देवकी नसे मी बाळा भाग्य यशोदेचे भाळी तुझे दुःख घेण्यासाठी केली पदराची झोळी जगावेगळी ही ममता जगावेगळी अंगाई ।।२।। रित्या पाळण्याची दोरी उरे आज माझ्या हाती स्वप्न एक उधळून गेले माय लेकराची नाती हुंदका गळ्याशी येता गाऊं कशी मी अंगाई ।।३।।

२६ . अनादि गणपती स्वामी

 २६ . अनादि गणपती स्वामी अनादि गणपती स्वामी चिंतामणी देवा  विद्याधर तुज म्हणती करिती सुरसेवा  नकळे ब्रह्मादिकां पार्वतीसुत यावा  भावा गावा ध्यावा मुनिमानस द्यावा  जयदेव जयदेव जय गणपती स्वामी  पंचप्राणे आरती करितो तुजला मी ।।धृ०।। परशांकुश कमला धरूनि अवलिला  शेंदूर चर्चित भाळा शोभे रिपु काळा  तनुरांकृत ज्वाळा ज्वाळांकृत भाळा  रुणझुणती नुपुरें चरणी घागरिया ।।१।। राजस सुंदर उंदीर ठुमक ठुमक चाले  हालत मालत डोलत लंबोदर आले  ध्यानी ध्याता दास सज्जन मुनी ध्याले  अगणित गुण गण वर्णित जनुपंडित बोले ।।२।।

२५ . वन्दे मातरम्

 २५ .   वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् सस्य श्यामलां मातरम् शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम् फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्, सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्  सुखदां वरदां मातरम् ॥१।। कोटी कोटी  कण्ठ कलकल निनाद कराले कोटी कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले के बोले मा तुमी अबले बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम् रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥२।। तुमि विद्या तुमि धर्म,  तुमि ह्रदि तुमि मर्म त्वं हि प्राणाः शरीरे  बाहुते तुमि मा शक्ति, हृदये तुमि मा भक्ति, तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥३।। त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी कमला कमलदल विहारिणी वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम् नमामि कमलां अमलां अतुलाम् सुजलां सुफलां मातरम् ॥४।। श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम् धरणीं भरणीं मातरम् ॥  वन्दे मातरम् ।।                           - बंकिमचंद्र चटर्जी 

२४ . नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

 २४ .  नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम् । महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥ प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम् शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये। अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गम् स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत्॥२॥ समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम् परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्। विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम् समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥ ॥भारत माता की जय॥                   - नरहरी नारायण भिडे 

२३ . यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणा

 २३ .  यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणा यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणा इन्द्रं यमं मातरिश्वानमाहुः। वेदन्तिनोऽनिर्वचनियमेकं यं ब्रह्मशब्देन विनिर्दिशन्ति ॥ १ ॥ शैवा यमीशं शिव इत्यवोचन् यं वैष्णवा विष्णुरितिस्तुवन्ति। बुद्धस्तथाऽर्हन्निति बौद्धजैनाः सत् श्री अकालेति च सिक्ख संतः ॥ २॥ शास्तेति केचित् प्रकृतीक कुमारः स्वामीति मातेति पितेति भक्त्या। यं प्रार्थयन्ते जगदीशितारं स एक एव प्रभुरद्वितीयः ॥ ३ ॥

२२ . जनगणमन अधिनायक जय हे

 २२ .  जनगणमन अधिनायक जय हे जनगणमन अधिनायक जय हे भारत भाग्यविधाता ।।धृ०।। पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविड उत्कल वंगा  विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधितरंगा  तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे                                        गाहे तव जयगाथा  जनगण-मंगलदायक जय हे भारत भाग्यविधाता जय हे,  जय हे,  जय हे,  जय  जय  जय,  जय  हे ।।१।। अहरह तव आव्हान प्रचारित, शुनि तव उदार वाणी  हिंदु बौद्ध सिख जैन पारसिक मुसलमान ख्रिस्टानी  पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन पाशे                                      प्रेमहार हय गाथा जनगण-ऐक्यविधायक जय हे भारत भाग्यविधाता जय हे,  जय हे,  जय हे,  जय  जय  जय,  जय  हे ।।२।।   पतन अभ्युदय बंधर पंथा युगयुगधावित यात्री  हे चिरसारथी तव रथचक्रे मुखरि...

२१ . खरा तो एकची धर्म जगाला प्रेम अर्पावें

 २१ .  खरा तो एकची धर्म जगाला प्रेम अर्पावें  खरा तो एकची धर्म जगाला प्रेम अर्पावें ।।धृ०।। जगी जे हीन अतिपतित, जगी जे दीन पददलित तया जाऊन उठवावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।१।। जयांना ना कोणी जगती सदा ते अंतरी रडती तया जाऊन सुखवावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।२।। समस्तां धीर तो द्यावा, सुखाचा शब्द बोलावा अनाथा साह्य ते द्यावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।३।। सदा जे आर्त अतिविकल, जयांना गांजती सकल तया जाऊन हसवावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।४।। कुणा ना व्यर्थ शिणवावे, कुणा ना व्यर्थ हिणवावे समस्तां बंधु मानावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।५।। प्रभूची लेकरे सारी तयाला सर्वही प्यारी कुणा ना तुच्छ लेखावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।६।। असे जे आपणापाशी असे, जे वित्त वा विद्या सदा ते देतची जावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।७।। भरावा मोद विश्वात असावे सौख्य जगतात सदा हे ध्येय पूजावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।८।। असे हे सार धर्माचे असे हे सार सत्याचे परार्थी प्राणही द्यावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।९।। जयाला धर्म तो प्यारा, जयाला देव तो प्यारा त्याने प्रेममय व्हावे, जगाला प्रेम अर्पावे ।।१०।।     ...

२० . असो तुला देवा ! माझा सदा नमस्कार

 २० .  असो तुला देवा ! माझा सदा नमस्कार असो तुला देवा ! माझा सदा नमस्कार तुझ्या दयादातृत्वाला अंत नाहि पार ॥धृ०॥ तुझ्या कृपेने रे होतिल फुले फत्तराची तुझ्या कृपेने रे होतिल मोति मृत्तिकेवी तुझ्या कृपेने रे होतिल सर्प रम्य हार  ॥१॥ तुझ्या कृपेने होइल उषा त्या निशेची तुझ्या कृपेने होइल सुधा त्या विषाची तुझ्या कृपेने होइल पंगु सिंधुपार  ॥२॥ तुझ्या कृपासिंधूमधला बिंदू जरि मिळेल तरी प्रभो ! शतजन्मांची मतृषा शमेल तुझे म्हणुनि आलो राया ! बघत बघत दार  ॥३॥  

१९ . हमने कभी किसीके हकपर ना हाथ डाला

 १९ . हमने कभी किसीके हकपर ना हाथ डाला हमने कभी किसीके हकपर ना हाथ डाला  सबको सदा दिया है सद्भाव का उजाला  लेकिन इन्साफ का किसीने उपहास जब किया तो  कपिराज बालीकीभी गर्दन मरोड़ डाला  रावण समान जालिम को धूल में मिलाना  निज पीठ ना दिखाना आदेश राम का है ।।१।।  हनुमान ने बनायीं जब राख स्वर्ग लंका  तो रामजन्मभूको क्या सोच और शंका  हो रामका मुख़ालिब और भारतीय वीरों  संभव नहीं कभीभी कहदो बजाके डंका  भारत वसुंधरा का संसार जानता है  ये देश अयोध्यापती अखिलेश राम का है ।।२।।

१८ . यह राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है

 १८ .  यह राष्ट्र केवल  जमीन का टुकड़ा नहीं है  यह राष्ट्र केवल  जमीन का टुकड़ा नहीं है  यह जीता जागता राष्ट्रपुरुष है हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है  कश्मीर इसका किरीट है,  पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं दिल्ली इसका दिल है, नर्मदा करधनी है  पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं  इसक चरण धुलाता  है, मलयनील विजन डुलाता है  सावन के काले काले मेघ इसकी कुंतल केशराशी है  चाँद और सूरज इसकी आरती उतारते है  यह देवताओंकी भूमि है, यह संन्यासियोंकी भूमि है  यह साम्राटोंकी भूमि है यह सेनानियोंकी भूमि है  यह ऋषियोंकी भूमि है, यह संतोंकी भूमि है,यह तीर्थंकरोंकी भूमि है  यह अर्पण की भूमि है,  यह तर्पण की भूमि है यह वंदन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है इसका कंकर-कंकर शंकर है,  इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है इसका कणकण हमें प्यारा है, इसका जनजन हमारा दुलारा है  हम जिएंगे तो इसके लिए, और मृत्युने बुलाया तो मरेंगे भी  इसके लिए और अगर मृत्यु के बाद हमारी हड्डीयाँ गंगाजीमे फेंक...

१७ . घाल घाल पिंगा वाऱ्या माझ्या परसात

 १७ . घाल घाल पिंगा वाऱ्या माझ्या परसात  घाल घाल पिंगा वाऱ्या माझ्या परसात माहेरी जा सुवासाची कर बरसात । सुखी आहे पोर सांग आईच्या कानात आई भाऊसाठी परि मन खंतावतं । विसरली का ग भादव्यात वर्स झालं माहेरीच्या सुखाला गं मन आंचवलं । फिरून फिरून सय येई जीव वेडावतो चंद्रकळेचा गं शेव ओलाचिंब होतो । काळ्या कपिलेची नंदा खोडकर फार हुंगहुंगुनिया करी कशी ग बेजार । परसात पारिजातकाचा सडा पडे कधी फूलं  वेचायला नेशील तू गडे । कपिलेच्या दुधावर मऊ दाट साय माया माझ्यावर दाट जशी तुझी माय । आले भरून डोळे पुन्हा गळा नि दाटला माऊलीच्या भेटीसाठी जीव व्याकुळला।                                 - कृ. ब. निकुंब

१६ . राधेकृष्ण गोपालकृष्ण

 १६ . राधेकृष्ण गोपालकृष्ण  राधेकृष्ण गोपालकृष्ण ।।धृ०।। कान्होबाच्या संगती ब्रम्हादिक इच्छिती  धन्य आम्हां म्हणती महां हां   हां   हां   हां  ।।१।। यमुनेच्या तीरी चेंडू खेळे वनमाळी  कृष्ण बुडाला यमुनाजळीं अरे रे  रे  रे  रे ।।२।। अजगर मारिला वणवाही ग्रासिला  गोवर्धन उचलिला अब  ब  ब  ब  ब ।।३।। मामा मारू गेलासी आपटिले गजासी  दोन वृक्ष उन्मळीसी अलू  लू  लू  लू  लू  ।।४।। ऐसे तुझे पवाडे ब्रह्मादिक झाले वेडे  विष्णुदास नामा म्हणे अहा  हा  हा  हा  हा  ।।५।।

१५. स्वावलंबी स्वाभिमानी भाव जगाना है

 १५.   स्वा वलंबी स्वाभिमानी भाव जगाना है स्वा वलंबी स्वाभिमानी भाव जगाना है, चलें गाँव की ओर, हमें फिर वैभव लाना है || हर घर में गो-माँ की सेवा, पशुधन का हो पालन, जल की रक्षा करने से हो, धरती माँ का पोषण | बने औषधि पंचगव्य से, खाद..... गोबर से, स्वच्छ रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे, भाव जगाना है, जड़ी-बूटी से खुशहाली, हमें गाँव में लाना है ||१|| गाँव में होगी जैविक खेती, जमीं के नेचे पानी, धान सब्जी फल और फूल से, सजेगी धरती सारी | कोई न होगा भूखा-प्यासा, पूरी होगी सबकी आशा, स्नेह और सहकारिता का, भाव जगाना है, कृषि-आधारित समृद्धि, हर गाँव में लाना है ||२|| ग्रामोद्योग विस्तार से सबका, निश्चित हो रोजगार, जिएं सादगी से सब रखें, मन में उच्च-विचार | गाँव का हर बच्चा हो शिक्षित, हर युवा संस्कारित निर्भिक, भारत माता के जय हो, यह भाव जगाना है, राम-राज्य के सपने को, साकार कराना है ||३|| ग्राम-नगर-वन के सब वासी, भारत की संतान, एक संस्कृति-एक धर्म है पुरखे सबके समान | ऊंच-नीच का भेद भुलाकर, कंधे से कंधा मिलाकर, समरसता का गीत गाकर, कदम बढ़ाना है, इस हेतु से तन-मन-धन, जीवन लगाना है ||४||

१४ . हिंद के जवान हम हिंद की है शान हम

 १४ . हिंद के जवान हम हिंद की है शान हम  हिंद के जवान हम हिंद की है शान हम  हिंद के निशान को बुलंद हम करे चले ।।धृ ०।। प्रबल ज्वाल माल हो आंधियां कराल हो  जलधि गगन भूमि पर तने प्रलय के जाल हो  किन्तु हम डरें नहीं कदम कदम बढ़े चलें ||१ ||  हिन्द हेतु जान दें हिन्द हेतु प्राण दें  हिन्द हेतु हम सभी सहर्ष रक्तदान दें  जयहिंद जयहिंद बोलते बढे चले ||२ || 

१३ . हे राष्ट्र देवतांचे हे राष्ट्र प्रेषितांचे

 १३ . हे राष्ट्र देवतांचे हे राष्ट्र प्रेषितांचे  हे राष्ट्र देवतांचे हे राष्ट्र प्रेषितांचे  आ चंद्र सूर्य नांदो स्वातंत्र्य भारताचे ।।धृ ०।। कर्तव्यदक्ष भूमी सीता रघुत्तमाची  रामायणे घडावी येथे पराक्रमाची  शिर उंच उंच व्हावे हिमवंत पर्वतांचे ।।१।। येथे नसो निराशा थोड्या पराभवाने  पार्थास बोध केला येथेच माधवाने  हा देश स्तन्य प्याला गीताख्य अमृताचे ।।२।। जेथे परंपरांचा सन्मान नित्य आहे  जनशासनातळींचा पायाच सत्य आहे  येथे सदा निनादो जयगीत जागृताचे ।।३।।

१२ . आज हिमालय के मस्तक पर

 १२ .  आज हिमालय के मस्तक पर आज हिमालय के मस्तक पर चीन हमे ललकार रहा दुनिया भर में मौत बाटकर बेशरमी से नाच रहा वंदे मातरम..वंदे मातरम वंदे मातरम..वंदे मातरम ।।धृ०।। भारत में कुछ चीन समर्थक छिपे हुये गद्दारो को सेना तुमको कसम देश की गोली मारो सारो को ये जयचंद है शरम बेचकर बिलकुल नहीं लजाते है गुणगान चाइना के गा कर रोटी भारत की खाते है वंदे मातरम..वंदे मातरम ।।१।। याद रखो ये बासठ नहीं ये नयी सदी का भारत है राष्ट्र भक्त अब सत्ता में है मोदी जी का भारत है एक इंच आगे बढ़ ने की हरगिज़ गलती मत करना अंजाम नहीं अच्छा होगा छोटी सी बात समज लेना वंदे मातरम..वंदे मातरम ।।२।। शांति के हम रहे पुजारी अपना है इतिहास यही किन्तु अगर कोई छेड़े तो देते तो तुरंत जवाब सही युद्ध अगर थोपा हमपर हम ईंट से ईंट बजा देंगे जयकार भवानी की करके हम पूरा चीन हिला देंगे वंदे मातरम..वंदे मातरम ।।३।।

११ . आओ बच्चो तुम्हे दिखाये झाकी हिन्दुस्थान की

११ .  आओ बच्चो तुम्हे दिखाये झाकी हिन्दुस्थान की आओ बच्चो तुम्हे दिखाये झाकी हिन्दुस्थान की इस मिट्टि से तिलक करो यह धरती है बलिदान की॥धृ॥ वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् ये है मुल्क मराठों का यहा शिवाजी डोला था मुघलों की ताकत को इसने तलवारों पे तोला था हर पर्बत पर आग लगी थी हर पर्बत एक शोला था बोली हर हर महदेव की बच्चा बच्चा बोला था शेर शिवजी ने रख्खी थी लाज हमारे शान की॥१॥ वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् जलियावाला बाग ये देखो यही चली थी गोलिया ये मत पूछो किसने खेलि यहा खून की होलिया एक तरफ़ बन्दूके दन दन एक तरफ़ थी गोलिया मरनेवाले बोल रहे थे इन्क़लाब की बोलिया यहा लगा दी बेहनोने भी बाज़ी अपनी जान की॥२॥ वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्  

१० . भुवनमण्डले नवयुगमुदयतु

 १० .   भुवनमण्डले नवयुगमुदयतु   भुवनमण्डले नवयुगमुदयतु सदा विवेकानन्दमयम् सुविवेकमयम् स्वानन्दमयम् ।।धृ०।। तमोमयं जन जीवनमधुना निष्क्रियताऽऽलस्य ग्रस्तम् । रजोमयमिदं किंवा बहुधा क्रोध लोभ मोहामिहतम् । भक्ति ज्ञान कर्म विज्ञानैः भवतु सात्विकोद्योतमयम् ।।१।। वह्निवायुजलबलविवर्धकं पाञ्चभोतिकं विज्ञानम् । सलिलनिधितलं गगनमण्डलं करतलफलमिव कुवार्णम् । दीक्षुविकीर्णं मनजकुलमिदं घटयतुचैककुटुम्बमयम् ।।२।। सगुणाकारं ह्यगुणाकारं एकाकारमनेकाकारम् । भजन्ति एते भजन्तु देवं स्वस्व निष्ठयाविमत्सरम । विश्व धर्ममिममुदारभावं प्रवर्धयतु सोहार्दमयम् ।।३।। जीवे जीवे शिवस्वरूपं सदा भावयतु सेवायाम् । श्रीमदूर्जितं महामानवं समर्चयतु निजपूजायाम् । चरतु मानवोऽयं सुहितकरं धर्मं सेवात्यागमयम् ।।४।।

९ . तेरे मेरे बीच में

 ९ .  तेरे मेरे बीच में तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना एक डोर खींचे,  दूजा दौड़ा चला आये कच्चे धागे में, बंधा चला आये ऐसे जैसे कोई दीवाना आपडीया - जैसे सब समझ गया  पहनूँगी मैं तेरे,  हाथों से कंगना जाएगी मेरी डोली,  तेरे ही अंगना चाहे कुछ कर ले ज़माना रोम्बा अडग्गा इरुक्के - ये रंब्बा रंब्बा क्या है  इतनी जुबाने  बोले, लोग हमजोली  दुनिया में प्यार की, एक है बोली  बोले जो शमा परवाना  नींद न आये मुझे, चैन न आये  लाख जतन कर रोक न पाए  सपनों में तेरा आना जाना